मुक्तक

चुप चुप के से मुझे क्यों देखती हो

मेरे पास आकर बात करने से क्यों शरमाती हो
जो वादा तुमने किया था, वो तो निभा दो
वादे का आंस तोडकर मुझे क्यों सताती हो
अगर मेरे प्यार की ना थी, तो मुझे ना बोल देना था
मेरा ख़त पढ़कर भी नहीं पढ़ा ऐसा झूठ क्यों बोलती हो
तुमने कहा – “मैं सिर्फ तुमसे दोस्ती रखती हूँ”
दोस्ती रखकर भी हमसे इतनी नफ़रत क्यों करती हो
– स्मित परमार

 

2 Comments

  1. babucm babucm 08/04/2017
  2. Kajalsoni 09/04/2017

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