गीत अपाहिज-सा यह मेरा

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

अधरों तक ही चल पाता है

बन प्रार्थना विकल्प रूप-सा

आँसू बनकर ढ़ल जाता है ।

 

शब्दों की बैसाखी पाकर

बात अधूरी कह पाता है

और भिखारी-सा बेचारा

ठोकर ही हर पल खाता है

 

अर्थ ढूँढ़ता अंधे युग में

अक्षर मन को छल जाता है

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

अधरों तक ही चल पाता है ।

 

मन में, उर में पीड़ा के स्वर

बिखर बिखरकर रह जााते हैं

कहने को ज्यों बादल आते

गरज गरजकर उड़ जाते हैं

 

प्यासे चातक-सा तब हारा

गीत बिचारा छल जाता है

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

अधरों तक ही चल पाता है ।

 

भाव उठें अथाह सागर से

है गहराई का माप नहीं

छन्दबद्ध लहरों को लेकिन

जर्जर नैया का मान नहीं

 

टूटी सीपी-सा गीत-रूप

तट पर बिखर कुचल जाता है

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

अधरों तक ही चल पाता है ।

 

कोमल उर की निर्मल धारा

सोचे गीतों को मिल जावे

तेरी वीणा के तारों से

स्वर में निर्मलता खिल जावे

 

छूकर किन्तु पीड़ा मन की

मेरा गीत बदल जाता है

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

अधरों तक ही चल पाता है ।

 

थका थका-सा गर मन मेरा

पूजा में तेरी रम जाावे

मेरी सारी शिथिल शक्तियाँ

गीतों में पुलकित हो जावें

 

पर तन का बिखरापन हरपल

सारा अर्थ बदल जाता है

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

अधरों तक ही चल पाता है ।

….. भूपेन्द्र कुमार दवे

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6 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
    • bhupendradave 07/04/2017
  2. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 07/04/2017
  3. Kajalsoni 07/04/2017
  4. C.M. Sharma babucm 07/04/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/04/2017

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