व्याकुल इंसान – – – डी के निवातिया

व्याकुल इंसान

 

दरखत झूमे, सरोवर तीर,
निर्झर निर्झर बहे बयार
पर्ण:समूह के  स्पंदन से,
सरगम की निकले तान
शीतल प्रतिच्छाया में,
पंछी समूह करते विहार
मानुष त्रस्त अविचल,
अंत:करण धरे कष्ट अपार
वट वृक्ष शीतलता पाने को
मृगतृष्ना सा व्याकुल इंसान !!

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डी के निवातिया

20 Comments

    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  1. C.M. Sharma babucm 06/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  2. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 06/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 06/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  4. Ajay Kumar Ajay kumar 07/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  5. Kajalsoni 07/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  7. sarvajit singh sarvajit singh 07/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/04/2017
  8. mani mani 08/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/04/2017
  9. Shyam Shyam tiwari 11/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 12/04/2017

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