akelaa

मेरे अंदर एक आग हैं
जिस में मैं जल रहा हूँ
बस अकेला बिना किसी साथ के
अपनी ही धुन में
अपना एक लश्य पर
पता नहीं कहाँ ओर कब तक
किस मंजिल पर चल रहा हूँ
कब ये आग बुझेगी
इसी आस में भटक रहा हूँ
कौन डालेगा पानी इस पर
बिना किसी की राह तके
खुद को जलाकर
किसी पर आँच ना आये
यही सोच कर मर रहा हूँ
ना खुद की खबर
ना खुद का कोई ठीकाना
अपने ही कुछ उसुलो पर
उसी सोच से कायम हुए
जिंदगी बसर कर रहा हूँ
कौन समझेगा मुझे
कौन चलेगा साथ मेरे
बिना किसी उम्मीद के
सब कुछ भुलाकर
अपने उस खुदा को
ही सब कुछ मानकर
जिंदगी से लड़ रहा हूँ
पिछले पन्नों को ना पलटा मैने
बस अपने लक्ष्य को साथ लेकर
जिंदगी की राहों में
फिर धोखा ना मिले
इसी इच्छा से
बिना किसी साथी के
अकेला ही आगे बढ़ रहा हूँ

Barkha Rani

One Response

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 05/04/2017

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