मधुकर जी, तुम फिर आ जाना —रक़ीम अली

.. 1…
प्रसंग: रात भर फूल के साथ रह कर भौंरा सुबह होते ही उससे दूर जा रहा है ।
फूल उसे शाम तक वापस आने का आग्रह करता है।
इसे मैंने किस प्रकार वर्णन किया है:

मधुकर जी, तुम फिर आ जाना
जाते ही कहीं भूल न जाना ।

शाम ढले खग-दल
कलरव करता उपवन में आ न पाए
अठखेली करता घास-केश से
पवन कहीं थक न जाए
अंतिम रश्मि- अरुण को जब हो जाना
मधुकर तब तक तुम आ जाना
जाते ही कहीं भूल न जाना ।

तम की चादर अम्बर में छा न पाए
दूर देश रवि चला न जाए।
आलम होगा अन्धकार का
तुम कैसे आ पाओगे
विरह तेरा हम सह न सकेंगे
तुम मुझको तड़पाओगे।

विगत शाम जब तुम आए थे
गुन -गुन करके तुम गाए थे
अदा में तेरे आकर्षण था,
लगा तू मुझको प्यारा था
मंद-समीर को सुगंध थमा कर
मैंने तुझे पुकारा था।

धूम मचाकर, मचल- मचल कर
पास मेरे, तुम आए थे
तुमने क्या स्पर्श किया था
जग की सारी खुशियां हम पाए थे ।
x x x x x x x x x x x x

सूरज की पहली किरण को पाकर
थोड़ा सा तुम अकुलाए थे
बंध-पाश को छोड़ा मैंने
तब तुम बाहर आए थे।

बीती रजनी हुआ सबेरा-
चले कहाँ, ऐ मधुप प्रिये तुम
समझ के इसको डेरा !
मधुकर जी, तुम फिर आ जाना
जाते ही कहीं भूल न जाना।

… 2..

देखते हैं, कुछ कवियों/कवियत्रियों के अंदाज-ए-बयां:

:कबीरदास:
काहें री भंवरि तू करी सयानी
छोड़ि चले करि मोहि अनजानी;
उपवन मैं बसति उपवन मैं बास
उपवन मांहि भौरे तोरि निवास;
कहैं कबीर साम तक आवैं
नाहिं करहिं तू मोहि उदास।

:सूरदास:
तुम बिन अलि बैरनि होइं कुंजैं
अब ये लता लगति अति सीतल,
साम तक होइं विषम ज्वाल की पुंजैं ।

:तुलसीदास:
केहि बासर बस प्रात ही चले सुमरि भ्रमरनाथ
तोहि दरस की लालसा रहे साम तक साथ।

:मीराबाई:
तुम बिन भ्रमर मैं कैसे रहौंगी
संध्या कालि तू जौ न आए
यह पीरा मैं कैसे सहौंगी ।,,

… -3….

:अब्दुर्रहीम ‘खानखाना’ :
मधुप मधुर-मधु है यह प्रेम का
मत देना विसराय;
रहिमन चटके न धागा प्रेम का
आकर शाम तक लेना इसे बचाय।

:बिहारी:
रात भर साथ रहे अलि
गई सुबीति बहारि;
सायं तक जो तुम न आये
रहि जाइ अपत कँटीली डारि।

:भारतेंदु हरिश्चंद्र:
तुम पवन यहैं कहियो असों
हम और कछू नहिं जानत हैं;
अलि प्यारे तिहारे
सायं तक आये बिना
एक फूल हैं जो नहिं मानत हैं।

:बंकिम चंद्र चटर्जी:
कोयाय जावे त्वम् प्रियतम्
त्वम् मम् अति हो भाता;
सोन्दे बेला एस्से जोवे भंवरो।।
जनममरणच त्वम् मम् नाता।

…-4…

:जयशंकर प्रसाद:
मज़ा बहुत आया था
जो आये थे तुम इस फुलवारी में;
आँख बिछाए रहेगा कुसुम यह,
सायं तक आ जाना
भ्रमर इस क्यारी में।

:मैथिली शरण गुप्त:
आता है यही इस मन में
छोड़ चलूं मैं बाग़-बगीचा,
भ्रमर तुम्हारे संग में;
हे मधुप ! मुझे मत मारो,
मैं अबला-बाला वियोगिनी-सा
सायं तक आने पर जरा विचारो।

:महादेवी वर्मा:
भ्रमर जाने से तेरे
बन जायेगी क्यारी यह
नीर भरी जल की बदली-सी;
आए न जो सायं-बेला तक
पाओगे तुम फिर
डाली एक सूखी दुबली-सी।।।

:फ़ैज़ अहमद फ़ैज़:
भौंरे किधर चले तुम
एक अजनबी फिज़ा के साथ;
शाम तलक जो न आये तुम
जुड़ जाएँगे सौ दर्द
मेरी ज़िन्दगी के साथ।

:हरिवंश राय ‘बच्चन’ :
भौंरे तुम भी याद करोगे
कैसी थी यह मधु, यह हाला;
दूर कहीं भी जाओगे
खींचेगी शाम तलक तुमको
यह प्याला-यह मधुशाला।

.. 5…
:डा. इक़बाल:
आएगा याद मुझको
ये रात का जमाना;
भौंरे, दिन भर कहीं भी रहना
शाम तलक आ जाना।
2. सारे जहां से अच्छा
तू प्यारा भंवरा हमारा;
यहीं रहना चमन के आसपास
शाम तक करेंगे, हम इंतजार तुम्हारा।

:गोपालदास नीरज:
जाओ भ्रमर पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं छा न पाए;
लिए पंख झिलमिल
जरा तेज उड़ के आना
इस दिल में विरह कहीं जग न जाए।

:गीतकार-1:
क्या जान कर भंवरे
तुम तो मुंह मोड़ जाते हो;
आ जाना शाम तक
अभी तो मेरा दिल तोड़ जाते हो।

:गीतकार-2:।।।
ना जइयो इ बगिया छोड़ि के
मोरे भौंरे
ना जइयो फुलवरिया इ छोड़ि के;
ऐसा फूल तोहिं कहां मिलेगा
शाम तक आइ जइयो मुंह मोड़ि के।

कल्पना कीजिए कि इस प्रसंग को लेकर कवि सम्मेलन हो रहा हो-उपरोक्त सभी poets/poetress कविताएं सुनाएं,
तो शाम होने को आ ही जाएगी।अब, अगर राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ को आंमत्रित किया जाय, तो उनका अंदाज कुछ ऐसा होगा-

: रामधारी सिंह ‘दिनकर’:
जैसे, एक जगी रमणी हो
प्राणों में लिए प्रेम की ज्वाला;
पंथ जोहती हुई
पिरोती बैठ अश्रु की माला-
ठीक उसी व्याकुल प्रमदा-सी
दशा मेरी तुम पाओगे;
संध्या-बेला के आ जाने तक
मधुप लौट जो तुम आओगे।

फिर भी, कुछ बात न बने और, अगर निराला जी को बुलाया जाय, तो इनका अंदाज-ए-बयां कैसा होगा, देखते हैं-

:सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’:
अबे ! सुन बे भ्रमर
थोड़ी सी मधु क्या पी ली
तू इतना इतराता है,
इस फूल को छोड़ कर जाता है !
देखता हूँ, संध्या-परी के
गगन से उतरने तक
तू कैसे नहीं लौट कर आता है ?

भौंरे की क्या मज़ाल कि अब वह न लौटे ?

… 6…

* एक निवेदन *
यह था फूल को लेकर एक भावनात्मक पहलू; जो मात्र कवियों का विषय-वस्तु रहता है।

फूल का दूसरा पहलू है सौंदर्य और सुगंध, जो कि लोगों के लिए एक खुशनुमा माहौल तैयार करता है।

फूल का तीसरा पहलू है जिस पर, तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग में, चर्चा बहुत कम होती है। किंतु, यह सबसे महत्त्वपूर्ण है; यह है खेत/बाग़ में खिला हुआ वह फूल जो अपनी हस्ती को मिटा कर बीज/फल का रूप धारण करता है और इंसानों की जिंदगियों को आधार प्रदान करता है- अनाज, दाल-दलहन, फल, मेवा इत्यादि के तौर पर।यह रेहान (फूल) ही है जो कि वस्त्र का रूप लेकर इंसान के अंग को ढकता है और उसके ओढ़ने-बिछाने के काम भी आता है।

वस्तुतः खुदा की दी हुई नियमतों में फूल एक निहायत अहम् नियमत है- हमें कुदरत का लाख-लाख शुक्र अदा करना चाहिए और फूल की दो-चार दिन की ज़िन्दगी से इबरत हासिल करनी चाहिए।

आइए, हम-आप अपने-अपने लिए दुआ करें-
हो मेरे दम से यूं ही
मेरे वतन की ज़ीनत;
जिस तरह फूल से होती है
लहलहाते हुए खेत की ज़ीनत।

।आमीन।

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/04/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/04/2017
  3. Kajalsoni 05/04/2017
  4. babucm babucm 06/04/2017
  5. raquimali raquimali 06/04/2017

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