एक दर्द

अनजानी सड़को पर
घर बना लेते है ये ,
भटकती रहो से ,
रिस्ता बना लेते है ये.
नहीं मिल पाती है इन्हें ,
एक वक्त की रोटी ,
झूठी मुस्कान से ,
पेट पकड़ कर रह जाते है ये ,
कूड़े के ढेर में अपना ,
भविष्य देखते है ये ,
आने वाले कल ,को
उसी में खोजते है ये .
थम से जाते है ये कदम ,
ऐसे नजारे देख कर ,
लौट आते है चुपचाप ,
ऐसा लगता है ,
आ गए है हम ,खुद से हारकर .
सड़को पर चलने वालो को ,
हो चाहत एक बार ,
इनकी आँखों की सचाई पड़ने को ,
कल नई सुबह होगी ,
शायद एक वक्त की रोटी होगी ,
इसी उम्मीद से सोते है ,
लेकिन …फिर अपनी सुबहः अपना बचपन
भीख के हवाले करते है .
काश तुम भी हँसते ,
थोड़ी खुसियो से रूबरू होते ,
तो न आज इन सड़को पर रोते ,
न किसी चित्रकार की तस्वीरों में होते ,
न मेरी कलम का हिस्सा होते ,
काश ..काश ,तुम थोड़ी खुसियो से रूबरू होते …

अंजली यादव
अटरिया -सीतापुर
कॉलेज – KGMU Lucknow
Mobile no.-9721550912

6 Comments

  1. babucm babucm 05/04/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/04/2017
  3. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 05/04/2017
  4. Kajalsoni 05/04/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/04/2017
  6. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 05/04/2017

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