बदलता वक़्त – राकेश आर्यन

कभी मुद्दतों से जमा किया रेत के दानों सा बिखर गया।
अब ना वो वक़्त रहा ना मौसम रहा ना रातें रही ना सहर रहा।
शरगोसियों में ढूंढता था ज़माल-ए-इश्क़ वो आशिक़ कभी,
बेखुदी में समझा तो बेपरवाह गुफ्तगू भी बे-असर रहा।

एक दो नही हजारों दास्ताँ है उस सफर के साथ वाबस्ता,
बेकशी में देखो ज़रा अब ना वो डगर रहा न सफर रहा।

शिकवे शिकायतों में ज़ाया किया मैंने, सुनहरा वक़्त मेरे हिस्से का,
परखने चला था लोगों को, मिला हर शख्स ज़ुबान-ए-खंज़र रहा

वक़्त दर वक़्त ये वक़्त गुज़रता रहा ,तुम बदलते रहे थोड़ा मैं भी बदलता रहा
हमदोनो के इस बदल में देखोे कैसा बदल गया मौसम,की ना तुम तुम रहे ना मैं मैं रहा।।

10 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 04/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 04/04/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 05/04/2017
  4. Kajalsoni 05/04/2017

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