डूब गया दिन

लहरों में डूब गया दिन

दो पल के सपने गिनगिन |

डालडाल पर बिखरे पत्ते

मौसम की गंध के लिए

जागे हैं अब सोए चेहरे

अपने अनुबंध के लिए

बागों में फूल खिले हैं

नभ पर हैं तारे अनगिन |

सपनो की नींव ढह गई

इन्द्रधनुष व्यर्थ हो गए

जीती बाजी तुमने हारी

इतने असमर्थ हो गए

अपने शब्दों की बैशाखी

बाँहों को हो रही क्षीण |

चन्दन पर विष कैसे फैले

चाहे हो सर्प ही विषैले

पूनो की श्वेत चाँदनी में

किसके तन के कपड़े मैले

दामन से चिपके जो धब्बे

लगते हैं वो हमें कठिन |

One Response

  1. C.M. Sharma babucm 04/04/2017

Leave a Reply