दूर कहीं एक खूबसूरत शाम देखता हूँ – राकेश आर्यन

दूर कहीं एक खूबसूरत शाम देखता हूँ।
दोस्तों की दुआ और न जाने कितने सलाम देखता हूँ।
वक़्त का पहर कमबख्त वक़्त को रास न हुआ शायद
हाथ से फिसलता हुआ मंज़र तमाम देखता हूँ।

दिललगी के सबब से बड़ा बेअदब हो गया हूँ मै
थोड़ा आज़ाद हुआ पर खुद को वक़्त का गुलाम देखता हूँ।
खैर खुद को बदलने का तज़ुर्बा बहोत काम आया मुझको
लफ़्ज़ों के समंदर से निकला तो बदला हुआ इंसान देखता हूँ।

जमाने की गलतियां नही देखता
ना खुद की बुराइयां खोजता हूँ अब
नदी में खुद का चेहरा कभी एक टुकड़ा आसमान देखता हूँ।

http://rakesharyan.wordpress.com

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/04/2017
    • Rakesh Aryan 03/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 03/04/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 03/04/2017
  4. Kajalsoni 03/04/2017

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