कभी हिंदी कभी उर्दू – राकेश आर्यन

हम सब ने बोली है कभी हिंदी कभी उर्दू।
अहम से नही हम से निकली है कभी हिंदी कभी उर्दू।
सियासत -ए- दांव पर बिखरी पड़ी है हर तरफ लाशें,
शाह-ए-नज़र में इंसान कोई नही
गिनती में है कोई हिंदी कोई उर्दू।

मेरे मज़हब ने तो जीने का सलीका बताया था मुझको
पर देखो जरा मज़हब की आंच में कैसे जलते हैं
कभी हिंदी कभी उर्दू।

जहां नुक्ते के बदल से खुदा हो जाते हैं ज़ुदा
जहाँ मौत देकर मांगी जाती हो ज़िन्दगी की दुआ
ऐसी शिकाफत-ए-शिकालत में बेबस है कभी हिंदी कभी उर्दू।

इस सरज़मीं पे ज़ुबान-ए-मोहब्बत सही
या दास्तान-ए-सितम सही मेरे रहनुमा?
याद रख तेरे बाद के नस्ल की कहानी तेरे आखिर से ही शुरू होगी।।

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/04/2017
  2. Rakesh Aryan 03/04/2017
  3. C.M. Sharma babucm 03/04/2017
  4. Kajalsoni 03/04/2017
  5. mani mani 04/04/2017
    • Rakesh Aryan 04/04/2017

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