कुछ ऐसा चाहता हूँ – अजय कुमार मल्लाह

मुझे मेरे हिस्से का इश्क़ मयस्सर क्यूं नहीं,
खुदा तुझसे इस बात का जवाब चाहता हूँ।

मालूम तो पड़े कीमत मुझे मेरे अरमानों की,
टूटकर बिखरते सपनों का हिसाब चाहता हूँ।

जिसकी रोशनी से रोशन हो सियहख़ाना मेरा,
अपनी ख़ातिर एक ऐसा महताब चाहता हूँ।

उसके चेहरे और आँखों में जो कुछ लिखा है,
चाहत है उसे पढ़ लूं ऐसी किताब चाहता हूँ।

जिसका हक़ीक़त से ज़रा न वास्ता हो ‘अजय’
अपनी आँखों के लिए ऐसा ख़्वाब चाहता हूँ।

14 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 03/04/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 03/04/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/04/2017
  4. Kajalsoni 03/04/2017
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/04/2017
  6. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 03/04/2017
  7. mani mani 04/04/2017

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