कुछ ना कुछ तो

कुछ ना कुछ तो मजबूरी है, आपस में इतनी दूरी है

कलियाँ साथ भले ही दे दें, उपवन साथ नहीं देता है |

एक गंध कर रही मसखरी

एक गंध की बातें गहरी

एक मलय के इन्तजार में

जाने कब से सांसें ठहरीं

धुंध सभी उड़ गए किन्तु अब दरपन साथ नहीं देता है |

किरणों की पहरेदारी है

सूरज ऐसा व्यापारी है

कोई ठगनी चाहे ठग ले

गोकुल की शोभा न्यारी है

कालिंदी बह रही किन्तु अब मधुबन साथ नहीं देता है |

यादों की धूमिल परिभाषा

मौन स्नेह की सिंचित भाषा

स्नेह सिक्त नयनो में छाई

हुई न जाने कैसी आशा

यौवन की देहरी पर आकर बचपन साथ नहीं देता है |

2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 03/04/2017
  2. Kajalsoni 03/04/2017

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