जिन्दगी खुली किताब

जिन्दगी खुली किताब पढ़ रहे हैं लोग

शब्दशब्द हाशियों में गढ़ रहे हैं लोग |

जिसके पृष्ठपृष्ठ पर लिखा ही दर्द है

कल्पना में बात सोचना भी व्यर्थ है

फिर भी नित नवीन जिल्द मढ़ रहे हैं लोग|

चाँदनी की बात चाँद को न ज्ञात हो

उस चकोर की भले ही जो बिसात हो

असम्भवी संभावनाएं जड़ रहे हैं लोग |

दर्द क्या है, दुःख क्या है, और क्या है गम

एकएक पाठ ये किसे पढाएं हम

अजनबी ये सीढियाँ हैं चढ़ रहे हैं लोग |

इतना ही देखकर मुझे तो ऐसा लग रहा

आदमी ही आदमी का खून पी रहा

शीलबातबात पर बिगड़ रहे हैं लोग |

जिंदगी खुली किताब पढ़ रहे हैं लोग |

One Response

  1. mani mani 04/04/2017

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