जूठन

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं,
बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं…

शोषण की आदत
है पुराणी हो गयी
सहलियाँ थीं कभी जो,
सब बेगानी हो गयीं
जिस्म ने मेरे कभी,
स्नेह को चख नहीं…!

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं,
बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं…

सिख दिया है खुद को
छिछोरापन सहना
क्योंकि किसी ने कहा था-
‘लाज ही है औरत का गहना’
हब्शियों की जूठन को
घूँघट का ढोंग भाता नहीं…

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं,
बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं…

बचपन में सुना था- एक राजकुमार
होकर सफ़ेद घोड़े पे सवार ,
थामकर मेरा हाँथ
ले जायेगा इस निर्मम दुनिया के पार;
पर इन हवस के भूखे युवराजों में
क्यों किसी ने मेरा हाँथ थामा नहीं ?

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं,
बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं…

औरतों को इज़्ज़त हम्फ…!
सब मिथ्या है, माया है
इज़्ज़तदारों ने ही तो
मेरी रूह का भाव गिराया है
भूखे कुत्तों की नज़रें
अब मुझे चुभतीं हैं नहीं…

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं,
बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं…

– निहारिका मोहन

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/04/2017
    • Niharika Mohan 01/04/2017
  2. babucm babucm 01/04/2017
    • Niharika Mohan 01/04/2017
  3. Kajalsoni 02/04/2017

Leave a Reply