मेरे गीतों की मृदु बोली

मेरे गीतों की मृदु बोली

पतझर में कोयल-सी होती

डाल डाल पर वाणी तेरी

इन गीतों से महकी होती ।

 

हर साँसों का लेखा-जोखा

तूफानों में मिट मिट जाता

जन्म-मरण का लेना-देना

कोरा कागज-सा बन जाता

 

तब अक्षर से बातें करती

पीड़ा मेरी हँसती गाती

मेरे गीतों की मृदु बोली

पतझर में कोयल-सी होती ।

 

सूने पथ पर थकित बिचारे

प्यासे पनघट जब पा जाते

प्यासे जग के प्यासे प्राणी

इन गीतों को गाते जाते

 

 

तुझे खोजती तेरी वाणी

इन गीतों की अपनी होती

मेरे गीतों की मृदु बोली

पतझर में कोयल-सी होती ।

 

निर्जल बदली, निष्ठुर बदली,

बूँद बूँद को तरसा करती

आँसू की अर्थी-सी पलकें

सबका दिल जब दहला जााती

 

तब करने श्रंगार सृष्टि का

वर्षा इन गीतों की होती

मेरे गीतों की मृदु बोली

पतझर में कोयल-सी होती।

 

कंपित प्राण दीप के होते

धुँआ धुँआ-सी बाती होती

और साँस की कुटिया जरजर

भीतर भीतर रोती होती

 

तुझे जगाने रात अमावसी

गीतों में पूनम-सी होती

मेरे गीतों की मृदु बोली

पतझर में कोयल-सी होती ।

 

सुरबाला-सी प्यारी साँसें

खाली प्याली भरने आती

पर माटी इस तन की प्यारी

टूटी प्याली-सी बन जाती

 

चरएाामृत तब तेरा पाने

इन गीतों की प्याली होती

मेरे गीतों की मृदु बोली

पतझर में कोयल-सी होती ।

 

….भूपेन्द्र कुमार दवे

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3 Comments

  1. babucm babucm 31/03/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 31/03/2017
  3. Kajalsoni 31/03/2017

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