हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है

 

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है

अपनी ही जिन्दगी का अंतिम वसंत देखा है।

 

हमने झुर्रियों में छिप बढ़ती उम्र निहारी है

हमने शून्य में विलीन होता अनंत देखा है।

 

दरके प्याले में थिरकता इक मधुकण देखा है

मयखाने के अंदर बैठा इक संत देखा है।

 

हमने बगिया में गुनगुनाता पतझर देखा है

वसंत ऋतु में भी कुनमुनाता वसंत देखा है।

 

कहती है आँधियों से जूझती दिये की बाती

हमने भी रोशनी से दमकता दिगंत देखा है।

 

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है

अपनी ही जिन्दगी का अंतिम वसंत देखा है।

……..भूपेन्द्र कुमार दवे

                        00000

 

4 Comments

  1. babucm babucm 30/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 30/03/2017
  4. Kajalsoni 30/03/2017

Leave a Reply