मैं बस इक लरजता आँसू हूँ

मैं बस इक  लरजता आँसू हूँ

जब चाहो  कहीं भी लुढ़का दो।

जी चाहे मिला  दो  मिट्टी में

या पी के  इसे मन बहला लो।

 

हूँ गम का सहारा पलकों में

हर दिल का सहारा सदमों में

पलकों में रहूँ या सीने में

गिरता हूँ सदा मैं कदमों में

 

चाहो अगर तो निज आँचल से

पोंछ अभी इसे तुम अपना लो।

मैं बस  इक लरजता आँसू हूँ

जब चाहो  कहीं भी लुढ़का दो।

 

मेरी कहानी बस है इतनी

होती है जितनी मुहब्बत की

दो पल जो ठहरकर नजरों में

लिख जाये दिल में मुहब्बत की

 

मैं कम भी नहीं इन आहों से

चाहो तो इसे तुम अजमा लो।

मैं बस इक लरजता आँसू हूँ

जब चाहो कहीं भी लुढ़का दो।

 

उजड़ा हुआ आलम है दिल का

आँखों में उमड़ते आँसू-सा

है अर्य अर्थ यही जीवन का

जब चाहे बहाना आँसू का

 

अपने  आँसू  रोक  लो चाहे

पर मेरा अश्क तुम ढुलका दो।

मैं बस इक लरजता आँसू हूँ

जब चाहो कहीं भी लुढ़का दो।

 

पानी कहो या कि मोती इसे

मैं दर्द हूँ सिर्फ उमर भर का

लग जाये अगर ठोकर तुमको

मैं साथी हूँ हर डगर पर का

 

रंज ना करना  कुछ भी मेरा

मैं आँसू हूँ  मुझे  ढुलका दो।

मैं बस इक लरजता आँसू हूँ

जब चाहो कहीं भी लुढ़का दो।

 

आँखें में नजाकत प्याले की

है प्यार ही साकी आँसू का

जो जावे छलक हर पीड़ा में

है प्यार का कतरा आँसू का

 

ठुकरा दे प्यार गर कोई  तो

आँसू को गिराकर बिखरा दो।

मैं बस इक लरजता आँसू हूँ

जब चाहो कहीं भी लुढ़का दो।

 

पानी नहीं यह खून हृदय का

उफन उफनकर बहा जाता है

सारी इच्छा अपरिभाषित कर

प्राण विहंग-सा उड़ जाता है

 

कैसे  कहें  उड़ते  पंछी  से

थके पंख  हमारे  सहला दो।

मैं बस इक लरजता आँसू हूँ

जब चाहो कहीं भी लुढ़का दो।

 

दग्ध हृदयों से उद्गम पाकर

यह अंगार-सा बन जाता है

छूकर काँटों का सा हृदय भी

पीड़ा में कुम्हला जाता है

 

मुस्काते  इस  कोमल  फूल को

किसी पत्थर दिल पर चढ़वा दो।

मैं बस  इक  लरजता आँसू हूँ

जब चाहो  कहीं भी लुढ़का दो।

 

मैं नन्हा  लरजता आँसू हूँ

पीड़ा में  तड़पता आँसू हूँ।

…. भूपेन्द्र कुमार दवे

00000

 

6 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 28/03/2017
  2. Kajalsoni 29/03/2017
  3. babucm babucm 29/03/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/03/2017
    • bhupendradave 29/03/2017
  5. vijaykr811 vijaykr811 29/03/2017

Leave a Reply