गदाए इश्क के कासे में थोड़ी सी रहम की भीख तो अब ड़ाल दे

 

 गदाए इश्क के कासे में थोड़ी सी रहम की भीख तो अब ड़ाल दे

 

गदाए इश्क के कासे में अब थोड़ी सी रहम की भीख तो  ड़ाल दे

वारफ्तगी में फंसा हूॅं घायल मेरे सीने से  तीर तो निकाल दे।

 

न कत्ल तुम कर तेग-ए-सितम से वो मेरे जीने की ये आरजू

सख्ती कसाने इश्क ओ साइल पर अब और न कोई सवाल दे।

 

तुम्हारी सर्भगी दीद और तुम्हारे गेसुओं के शायक हम भी थे कभी

इक शिकस्ता.ओ मुन्तशिर बन गया अब और न कोई मलाल दे।

 

मेरे खोये हुए इशरत-ए-रफ्ता मेरे आशनाई अब मुझे लौटा दो

ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त मेरे हमदम इल्फात-ए-अहवाल दे।

 

बहुत फेरे लगाये आस्तान-ए-यार की सह लिए जौर-ए-जफा

रह गया महरूम वफ़ाए इश्क से बस अब हाथ में करताल दे।

 

बे तकल्लूफ में हम जी रहे थे अब तलक अपने नसीब लेकर

बदल अपने खिसाल-ए-सरिश्ते मिजाज अब मुझे इतिसाल दे।

 

अब कहॉ वो सब्र-ओ तहम्मुक वो मेरे जज्बात-ए-जुस्तजू

मेरे जराहते-दिल में सख्ती-कसाने-इश्क तो मोमिसाल दे।

 

दिल-ए.रंजूर कबतलक तड़पेगा गाफिल-ए-पागलों की तरह

उलझकर रह गई है जिंदगी इस कदर अब न खिसाल दे।

 

बी पी शर्मा  बिन्दु

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/03/2017
  2. Kajalsoni 29/03/2017

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