तुम जीत गई, मैं हार गया

तुम जीत गई, मैं हार गया        

हे मृत्यु !

तुम जीत गई, मैं हार गया।।

 

मैंने  तो  अपने  जीवन में

अन्तः की घबराहट सुन ली

साँसों के  कोलाहल में  भी

तेरी  मैंने  आहट  सुन ली

 

तुम आयी, मेरा तो संसार गया

हे मृत्यु !

तुम  जीत  गई,  मैं हार गया।।

 

मीठे  सपने   मैंने  देखे

गमगीन  नजारे भी  देखे

जीवन की अंधी आँखों से

हर क्षण परिवर्तन ही देखे

 

मिला प्रकाश न अंधकार गया

हे मृत्यु !

तुम जीत  गई,  मैं हार गया।।

 

जो होना था,  सो होना था

क्या सोच करूँ  सोते जगते

ठोकर खाकर  गिरते गिरते

सम्हल सका न चलते चलते

 

बैसाखी  का भी आधार गया

हे मृत्यु !

तुम जीत गई, मैं हार गया।।

 

मैंने  तो चाहा था  लेकिन

मन चाही मौत नहीं मिलती

आँखों के आँसू-सा बनकर

पलभर में मौत नहीं बहती

 

 

हर मानव बस लाचार गया

हे मृत्यु !

तुम जीत गई, मैं हार गया।।

 

है भाग्य  तूलिका  छितरी-सी

रखे ज्ञान  न विविध रंगों का

भरती है  पर  चित्र  अधूरा

रखकर ध्यान क्लिष्ट रंगों का

 

इससे  सारा  श्रंगार  गया

हे मृत्यु !

तुम जीत गई, मैं हार गया।।

 

हर पल मरणतुल्य था फिर भी

जीवित  कर पाया  मैं  आशा

पर  तू  मेरे  ही  काँधों  पर

लाद  गया  अर्थी  का  साया

 

धैर्य  जुटाना  बेकार  गया

हे मृत्यु !

तुम जीत गई, मैं हार गया।।

 

मैंने तो तन, मन, धन सब में

मिथ्या का  आभास  किया था

फिर भी  कुछ था  मेरे भीतर

जिसका मैंने  रास  किया था

 

वही अहं अब निस्सार गया

हे मृत्यु !

तुम जीत गई,  मैं हार गया ।।

 

…. भूपेन्द्र कुमार दवे

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7 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 28/03/2017
  2. Guru dev singh Guru dev singh 28/03/2017
  3. Kajalsoni 29/03/2017
  4. C.M. Sharma babucm 29/03/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/03/2017
  6. davendra87 davendra87 29/03/2017
  7. vijaykr811 vijaykr811 29/03/2017

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