भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी

फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ

तृप्ति-सिन्धु  है  मंदिर  तेरा

फिर क्यूँ मैं प्यासा रह जाऊँ?

 

मुझको  भूल गया  फिर भी

तेरा  साया  मैं   पाता  हूँ

हर   खामोशी  सन्नाटे  में

धड़कन अपनी सुन पाता हूँ

 

देख   देखकर  तेरी  मूरत

क्यूँ ना  दर्शन-प्यास बुझाऊँ

भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी

फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?

 

रही  न अब पतवार हमारी

आँधी  औ  तूफान क्षणों में

तू ही तो इन निष्ठुर पल में

स्फूर्ति  जगाता था  प्राणों में

 

अब  क्यूँ ना मैं तुझे पुकारूँ

क्यूँ न  शरण में  तेरी जाऊँ

भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी

फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?

 

नीड़ तोड़ती  चली  हवाएँ

छिन्न-भिन्न कर पंख हमारे

और  निराश्रित मेरी आशा

दूर गगन में  तुझे निहारे

 

श्रद्धा  के  ही  पंख बचे हैं

क्यूँ ना भक्ति उड़ान लगाऊँ

भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी

फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?

 

हर पीड़ा  के  साथ  जगे  हैं

अंधकार   में  दीप  जले  हैं

फिर भी मुझको कलुषित करने

धुआँ  दीप  को  बुझा चले हैं

 

कैसे  कंपित ज्योत-शिखा से

अंतहीन  अंधकार   मिटाऊँ

भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी

फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?

 

विकल देख  यूँ मुझको मेरी

आशा ही जब छोड़ चली हो

मृत्यु  का  आव्हान  गुंजाने

प्राणों से  इक हूक उठी हो

 

क्यूँ ना  श्रद्धा  दूनी  करके

इस माटी को मुक्ति दिलाऊँ

भक्ति मेरी  है,  शक्ति तेरी

फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?

…… भूपेन्द्र कुमार दवे

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6 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 27/03/2017
  2. shivdutt 27/03/2017
  3. babucm babucm 27/03/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/03/2017
    • bhupendradave 27/03/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 28/03/2017

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