कुछ जले हुए खतों पे मेरा नाम था -विवेक जोशी “जोश”

कुछ जले हुए खतों पे मेरा नाम था

ये हो न हो सिर्फ उसी का काम था

कल ही की बात हो जैसे वो महफ़िल

सामने वो बैठा मेरे हाथों में जाम था

कुछ जले हुए खतों पे मेरा नाम था…

हुनर की उसके दाद देता हूँ मैं

क़त्ल हुआ अरमानों का सरेआम था

कुछ जले हुए खतों पे मेरा नाम था…

आज फिर हवाओं ने छुआ यूँ मुझे

एहसास यूँ हुआ की उनका पैगाम था

कुछ जले हुए खतों पे मेरा नाम था…

हम कब न थे आशना लोगों के लिए

शहर मैं उनके मैं बदनाम था

कुछ जले हुए खतों पे मेरा नाम था…

-विवेक जोशी “जोश”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/03/2017
  2. Kajalsoni 25/03/2017

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