आज कब्रस्ताँ मेरा, गुलशन सा जान पड़ता है।

आज कब्रस्ताँ मेरा, गुलशन सा जान पड़ता है।
कब्र पर सजदे में मेरी, मेरा कातिल आज आता हे,
मैं मुर्दा-गड़ा-पड़ा यहाँ, सब देख आज पाता हुँ,
शोर तालियों का मुझे, लगता अन्धों से आया करता हैं।
गुफ्तगुँ मेरी जिन्दगी पर, मेरी क़ौम पर; आज, साल-भर के गूँगे करतें हैं,
एहसानमन्द करने मुझे, ठगों का हुजूँम आया करता हैं;
ये ऊँची-ऊँची आवाज़े, ये बड़ा-चौड़ा बंदोबस्त मुझे, आपसी दावत का इंतज़ाम लगता है,
आज कब्रस्ताँ मेरा, मुझे गुलशन सा जान पड़ता है।।

-प्रान्जल जोशी।

8 Comments

  1. babucm babucm 25/03/2017
    • Pranjal Joshi 27/03/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/03/2017
    • Pranjal Joshi 27/03/2017
  3. Kajalsoni 25/03/2017
    • Pranjal Joshi 27/03/2017
  4. vijaykr811 vijaykr811 27/03/2017
    • Pranjal Joshi 28/03/2017

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