प्रेम का रतन – दीप्ति

तुम दूर रहो या पास
इससे पड़ता नहीं है फर्क मुझे ख़ास
मिल गया है जो प्रेम का रतन तुमसे
बाकी नहीं रही अब
किसी से कुछ भी पाने की आस
मरकर भी ना निकलेगी खुशबू तेरे बदन की मुझसे
मेरी मिट्टी से उड़ उड़ कर महक तेरी
बनाएगी हर गुलिस्ता और चमन को सदा ख़ास

दीप्ति

10 Comments

  1. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 24/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  2. C.M. Sharma babucm 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  4. Kajalsoni 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/03/2017

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