पराभव

चैसठ चतुर्युगी शासन पर हावी चालिस साल विहंगम।
क्रमिक हुआ अतिक्रमण, अन्ततः पैत्रिक संपत् मान रहे जम।
दिल का ज्ञानचक्षु कर वेधन, धनकुबेर को लूटा जमकर-
पुष्पक छीन बनेे जो अधिपति, शुरू पराभव निकल रहा दम।।

रावण-कंस सरीके श्रीमन् मच्छर मान नकारें अरि को।
दंभ मसल देने का भरते, देखे पढ़े विषम विषधर को।
कैसे असाध्य डेंगू बन मच्छर करते आये धराशाहि हंै-
तदपि न आशा त्याग सके, पर झाग झलित करें अधर को।।

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/03/2017

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