कद-पद !

कद-पद या कि उपाधियां, पहुचें आधि-समीप।
चित्त-वृत्ति तूफान में, विचलित हो ज्यों दीप।।
विचलित हो ज्यों दीप, सीप वत् मोती ढालें।
अनासक्त ही भोगें कद-पद भ्रम क्यों पालें?
मानस-विकृति आधि तन पहुंचे बनकर व्याधि।
इन सबका उपचार इक आतम-लीन समाधि।।

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