कविता सहज स्वभाव

कविता सहज स्वभाव है, उस पर कृत्रिम धुंध।
महज गलेबाजी में, ख्ंिाचते, पिचकें छन्द।।

मन कलुषित, तन स्वच्छ है, उस पर वसन विशेष।
सन्त-वेश धारे मगर, लूटमार अनिवेश।।

अंगारों पर राख की पड़ी परत अति गाढ़।
सत् स्वरूप अनभूति हित असत् परत दो झाड़।।

One Response

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/03/2017

Leave a Reply