‘नवभारत की मांए’ – कविकृशिव

ll  भारत में जन्मी हिंदी और उर्दू की दशा पर कुछ पंक्तिया  ll

एक माँ की दो बेटी,  सज सवंर के आई थी

शायरी कवाली तहजीब में लिपटी,  काव्य कविता लायी थी

गुलामी पर जब जम कर बरसी, हमने आजादी की सरगम गयी थी

इल्म न था किसीको इस हश्र का,  की ये ऐसे मुह की खाएंगी

एक को मजहब का मर्ज़ लगा,  दूजी को  रोग  विलायती

उर्दू संग खेलु  तो कौमी दिखु , हिंदी  संग  बैठु  तो  गंवार  निहायती

न  न ….भाषा  न  कहिये  जनाब …. ये  नवभारत  की  मांए  थी  ll

12 Comments

  1. Neetu 20/03/2017
    • KaviKrishiv KaviKrishiv 20/03/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 20/03/2017
    • KaviKrishiv KaviKrishiv 20/03/2017
  3. babucm babucm 20/03/2017
    • KaviKrishiv KaviKrishiv 20/03/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/03/2017
    • KaviKrishiv KaviKrishiv 20/03/2017
  5. Kajalsoni 21/03/2017
    • KaviKrishiv KaviKrishiv 21/03/2017
  6. mani mani 21/03/2017
    • KaviKrishiv KaviKrishiv 21/03/2017

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