कविता—बापू का आना

जबसे तुम गये हो तब से सब कुछ बदल गया है

जितना फैलाकर गये थे सब कुछ सिमट गया है

तुम सत्य की बात करते थे आज हर तरफ फरेब है

तुम्हारे सत्य के प्रयोग पर आज सत्य से ही गुरेज है

तुम्हारी फोटो के सामने आँखों में धूल झोंकते हैं

तुम्हारी फोटो लगे नोटों पर दाव ठोंकते हैं

आकर तुम इन्हें सुधार पाओगे

पता नही बापू तुम कब आओगे ||1||

अहिंसा की बातों से हिंसा फैलाते हैं

तुम्हारी जगह सिर्फ अपनी चलाते हैं

कौन कितने पानी में है ये सब जानते हैं

तुम्हारी नही लोग अब इनकी मानते हैं

क्या सही है और क्या गलत इससे क्या होता है

जो खुद को ठीक लगे वही सही होता है

आज तुम इनके सामने टिक पाओगे

पता नही बापू तुम कब आओगे ||2||

जब तुम यहाँ आओगे तो पता नही तुम्हें कैसा लगेगा

काम कैसा भी हो लेकिन उसके लिए पैसा लगेगा

मुझे तो डर है कि लोग तुम्हें पहचानेंगे कि नहीं

चलो पहचान भी लिया तो तुम्हारी मानेंगे कि नही

तुम्हारे जैसे दुबले और सच्चे इन्सान का क्या होता है

तुम तो जानते हो कि सब कुछ ताकतवर का होता है

कहीं तुम इनसे घबरा तो नही जाओगे

पता नही बापू तुम कब आओगे||3||

मुझे पता है तुम्हें यहाँ से गये एक जमाना हो गया है

पता है आज के अधिकतर लोगों का जमीर सो गया है

आज लोग पल भर में अपनी जबान को बदल लेते हैं

झूठे कपटी भ्रष्टाचारी लोग सच्चों को दोष देते हैं

अंग्रेजों से तो खूब लड़े थे किन्तु अपनों से कैसे लड़ोगे

झूठ के देवताओं पर सत्य का प्रयोग किस तरह करोगे

कही तुम भी तो इनकी तरह नही हो जाओगे

पता नही बापू तुम कब आओगे||4||

                

6 Comments

  1. babucm babucm 20/03/2017
    • Dharmendra Rajmangal 23/03/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 20/03/2017
    • Dharmendra Rajmangal 23/03/2017
  3. Rakesh Pandey 21/03/2017
    • Dharmendra Rajmangal 23/03/2017

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