दीवानगी – अजय कुमार मल्लाह

अपने हाथों से अपनी ज़िन्दगी तबाह करता हूँ,
मैं जानबूझ कर हर बार यही गुनाह करता हूँ।

बहुत मुश्किल है तेरा ख़्याल अपने ज़हन से मिटाना,
तुझे ही देखता हूँ मैं जिधर भी निगाह करता हूँ।

अच्छा लगता है तेरी तारीफ़ में क़सीदे पढ़ना,
तु गाली भी दे मुझे तो वाह! वाह! करता हूँ।

तेरी मासूमियत पे हूँ मैं इस कदर फिदा हुआ,
तुझे पाने की चाह में तक़दीर स्याह करता हूँ।

गर अब भी कोई कहता है तु मेरी नहीं “करुणा”,
तो उसकी बातों को साबित मै अफ़वाह करता हूँ।

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/03/2017
  2. babucm babucm 18/03/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 18/03/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/03/2017

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