बदलते रिश्ते

चिमनी से उठता हुआ धुंआ,
कर रहा है बयान,
किसी के घर की दास्ताँ…
कहीं कुछ जल रहा है,
बुझा दो, दो दिल राख न बन जाएँ…

चल रहे हैं इस तेज़ी से,
बेदर्द हवाओं के झोंके,
बदल न दे चिनगारियों को शोलों में,
रोको, दो जान सुलग न जाएँ…

तिनका-तिनका बना था जो आशियाना,
दिल के दरों और अरमानों की दीवारों से,
दरारों के बीच कहीं खो न जाए,
देखो, कहीं ढेर हो न जाए…
दो दिल राख न बन जाएँ…
दो जान सुलग न जाएँ…

5 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 17/03/2017
  2. babucm babucm 17/03/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/03/2017
  4. Kajalsoni 19/03/2017

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