मुक़ाम ए बन्दगी – शिशिर मधुकर

मुहब्बत की झलक देखी पर ना देखी है दीवानगी
तूफ़ान में वो डगमगा गए उनसे उम्मीदें जब जगीं

उनकी तस्वीर दिल दिमाग में कुछ ऐसी बस गई
लाख चाहा खत्म ना होती उन्हें पाने की तिश्नगी

मुहब्बत ना हो अगर पास में कुछ भी सूझता नहीं
सहरा की सूखी रेत सी बन बिखर जाती है जिंदगी

कितने जवान इसके लिए यहाँ पर इंसान बन गए
समझो ना इस जज़्बे को तुम कोई हसीं दिल्लगी

मधुकर ख़ुदा दिखने लगे जो पाक चेहरे में यार के
मुहब्बत को तुम ले गए हो फिर मुक़ाम ए बन्दगी

शिशिर मधुकर

14 Comments

    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2017
  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 14/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2017
  3. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 14/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/03/2017
  4. C.M. Sharma babucm 14/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
      • C.M. Sharma babucm 15/03/2017
        • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
  5. Kajalsoni 16/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/03/2017

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