ख़ुलूस-ओ वफ़ा का सिला पाइएगा

ख़ुलूस-ओ वफ़ा का सिला पाइएगा ।
हुजूम-ए तमन्ना में खो जाइएगा ।

दिए जाएगा ग़म कहाँ तक ज़माना,
कहाँ तक ज़माने का ग़म खाइएगा ।

जिसे दीजिएगा सबक़ डूबने का,
उसे क़तरे क़तरे को तरसाइएगा ।

अँधेरों में दामन छुडाया है लेकिन,
उजालों से बच कर कहाँ जाइएगा ।

बढ़ाए चला जा रहा हूँ पतंगें,
न कब तक मेरे हाथ आप आइएगा ।

उधर हूर-ओ कौसर इधर जाम-ओ साक़ी,
किसे खोइएगा किसे पाइएगा ।

सहर ने रबाब र रग-ए गुन्चा छेड़ा,
‘ज़िया’ की ग़ज़ल अब कोई गाइएगा

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