गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार।

वरना तेरी वीणा पर मेरा क्या अधिकार।

 

मौन कंठ है, मौन अश्रू हैं

गुमसुम है सब सूनापन भी

गीत अधूरा, बोल अछूता

बुझा-बुझा-सा है तन मन भी।

 

मधु की बूँदें बनकर जब बरसें अश्रू अपार

अधरों पर तब खिलता है शब्दों का श्रंगार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार।

 

तूफानों में चलने आतुर

बोल गीत के मचला करते

लहरों से भी टकराने की

अर्थ गीत में उछला करते।

 

नैया दुख की हो जिसकी हो पीड़ा पतवार

सुन सकता है तब नाविक आँधी की ललकार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार।

 

सुन सकते हम आँसू गिरना

जब अधरों उठता हो कंपन

या पतझर में कोयल बोली

करने को हो शाश्वत चिंतन।

 

पीड़ा ही रच सकती है शब्दों का संसार

गीतों की रचना में पीड़ा ही है आधार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार।

 

जोड़े नाता गीतों से गर

बिखरी साँसें अपना बंधन

तब पीड़ा के रथ चक्रों से

उठ पड़ता है गीतों का गुँजन।

 

हर आँसू में होती पीड़ा की मूक पुकार

बनता है शबनम मोती पाकर अश्रू बयार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार ।    

                                .. … भ्रूपेन्द्र कुमार दवे

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5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/03/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 13/03/2017
  3. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 13/03/2017
  4. Kajalsoni 13/03/2017
  5. C.M. Sharma babucm 13/03/2017

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