छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर
मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।

कँप कँप लहरें उठती जाती
हर छंद बद्ध के मंथन की
गीतों में उठती जाती है
हर छवि तेरे दर्शन की।

ज्यों कंपित कंठों में राग छिपा है सुन्दर
मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।

नभ में उड़ते खगगण सारे
करते हैं नवगीत तरंगित
इससे मौन-हृदय में होती
गीतों की हर रचना मुखरित।

जैसे सुख-दुख छिप जाते हैं मेरे अंदर
मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।

छिप जाती सीपी सागर में
मोती भी सीपी के अन्दर
वैसे छिपते प्राण प्राणी के
लेकर तेरी छवि अति सुन्दर।

तेरी वाणी में छिप जाते जैसे अक्षर
मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।

खोल पंखुड़ियाँ मुक्ति पाती
जो कवि-कल्पना की कलियाँ
मुक्ति समय में वो ही आकर
कर जाती हैं बंद पुतलियाँ।

जैसे माटी में माटी छिप जाती नश्वर
मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।

……. भ्रूपेन्द्र कुमार दवे

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6 Comments

  1. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 11/03/2017
  2. bhupendradave 11/03/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/03/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 12/03/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 12/03/2017
  6. C.M. Sharma babucm 12/03/2017

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