गुरुर-ए-हुस्न

आता नहीं तुझे मोहब्बत करने का तरीका
तो तू क्या जाने जिन्दगी जीने का सलीका
और भी है इस महफ़िल में
इक तू ही नहीं है हुस्न की मल्लिका

माना कि हुस्न की अमीर है तू
पर जानू मै दिल की कितनी गरीब है तू
हुस्न-ए-बाज़ार में खरीददार होंगे तेरे बहुत
पर मै दिल का सौदागर हूँ,नही जोर इसपर किसी का

शीशे के सामने खुद पे इतराएगी तू
पर दिल के आइने से खुद को छिपाएगी तू
छुप न पाएगी तू दिल के आइने से
उठ जाएगा एक दिन पर्दा,इस पर्दानशीं का

ढल जाएगी इक दिन तेरी हुस्न की जवानी
उस दिन पछताएगी और बहाएगी अपने आँखों से पानी
होगी तू कभी ऐसी किसी महफ़िल में
दिल लगाना तू चाहेगी ,लोग कहेंगे वक़्त नही अब इसका

10 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 29/03/2017
    • vijaykr811 vijaykr811 29/03/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/03/2017
    • vijaykr811 vijaykr811 29/03/2017
  3. Kajalsoni 29/03/2017
    • vijaykr811 vijaykr811 30/03/2017
  4. babucm babucm 29/03/2017
    • vijaykr811 vijaykr811 30/03/2017
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 29/03/2017
    • vijaykr811 vijaykr811 30/03/2017

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