अब हर तरफ़ ज़िया ही ” ज़िया ” अंजुमन में है

अहसास को ज़ुबां न मिली किस तरह कहूँ
कैफ़ियत ए लतीफ़ जो रंज ओ मुहन में है |

शरह ओ बयान ए ग़म की इजाज़त मिली मगर
अपनी ख़बर ही किस को तेरी अन्जुमन में है |

ताब ए नज़र अगर हो तमाशा करें कलीम
अब हर तरफ़ ज़िया ही ” ज़िया ” अन्जुमन में है |

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