बचपन तो कहीं खो गया (09 March 2017)

बच्चों का  बचपन, अब तो खो गया

हांथों में है मोबाइल , मैदान खो गया

दिमाग तो है चलता, हेल्थ खो गया

खेलों के नाम पर, मोबाइल गेम आ गया ।।

 

किसी को फिकर कहाँ है,शॉर्टकट आ गया

कसरत के नाम पर भी, खुला आसमान खो गया

बंद कमरों में बैठकर , बस बच्चा रह गया

पाबंदियों का कितना, उस पर टार्चर हो गया ।।

 

मासूम सा था बच्चा, बचपन खो गया

बंदिशों में पलकर, वो तो रह गया

खुला आसमान देखने को, वो तरस गया

कैसे अब कोई समझे, ये क्या हो गया ।।

 

कभी टी वी पर वक़्त बीता, माँ बाप बिन सो गया

आया के भरोसे ही, अब सब रह गया

पैसे के दम पे ममता का, मोल हो गया

माँ के दूध का सौदा, डिब्बे पर हो गया ।।

 

माँ की खुशबू को भी, बच्चा तरस गया

बाप के होते हुए भी, प्यार से मरहूम हो गया

माडर्न होने का ,ये क्या भूत चढ़ गया

ऑफिस के बाद , नाईट क्लब का टाइम हो गया ।।

 

रात-२ भर का, ये तमाशा हर रोज हो गया

मॉर्निंग टाइम का आना, अब हर रोज हो गया

छोटा बच्चा भी तो, खुद ही जिम्मेदार हो गया

आया ही अब तो , उसकी माँ- बाप हो गया ।।

 

बाहर खेलने का सपना , अब तो रह गया

बचपन जाने कहाँ , अब तो खो गया

खुद रो-२ कर , अब तो सो गया

बचपन तो मेरा , कहीं खो गया ।।

 

कमलेश संजीदा

kavikamleshsanjida@gmail.com

 Mobile No. 9410649777

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/03/2017
  2. C.M. Sharma babucm 10/03/2017
  3. Kajalsoni 10/03/2017
  4. आलोक पान्डेय आलोक पान्डेय 10/03/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 11/03/2017

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