ज़िन्दाबाद – अजय कुमार मल्लाह

तु काटता है सिर जिहाद के लिए,
ज़िन्दगियाँ बाँटता हूँ मैं ज़िन्दाबाद के लिए।

फिज़ूल तेरे खून की रवानी है क़ातिल,
अपने भाई मारता है तुझ सा नहीं जाहिल,
तु छेड़ता है रोज जंग मुर्दाबाद के लिए,
ज़िन्दगियाँ बाँटता हूँ मैं ज़िन्दाबाद के लिए।

मजबूरन मुस्कुराता हूँ देखकर तेरी ज़िहालत,
बाज़ आता नहीं तु करता आतंक की वकालत,
चर्चा है तेरी दुनिया में फैले उन्माद के लिए,
ज़िन्दगियाँ बाँटता हूँ मैं ज़िन्दाबाद के लिए।

ये तो बड़ों का बड़प्पन है चोट खाकर भी घाव नहीं देते,
मेरा बस चलता तो तुझे भारत में रखने पांव नहीं देते,
इतना वक़्त नहीं देता करे तु बर्बाद के लिए,
ज़िन्दगियाँ बाँटता हूँ मैं ज़िन्दाबाद के लिए।

16 Comments

  1. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 09/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/03/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 09/03/2017
  5. Kajalsoni 09/03/2017
  6. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  7. babucm babucm 10/03/2017
  8. आलोक पान्डेय आलोक पान्डेय 10/03/2017

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