पता – अजय कुमार मल्लाह

उसका पता पता होता तो मै ये ख़ता ज़रूर करता,
किस हाल मे है जान मेरी मै ये पता ज़रूर करता।

तप्ती धूप में मै आज भी, उसको तलाशा करता हूँ,
वो भी मेरी ख़ातिर बेचैन होगी, ऐसी ही आशा करता हूँ,
मिलती तो उसकी हर ज़िद मै हँसकर मंजूर करता,
किस हाल मे है जान मेरी मै ये पता ज़रूर करता।

कैसी है वो किस हाल में, कितना बदली छह साल में,
पूछता बस यही सवाल, तुम्हे आया नहीं मेरा ख़याल,
ज़िक्र बीते दिनों का मै उससे भरपूर करता,
किस हाल मे है जान मेरी मै ये पता ज़रूर करता।

पर अफसोस अब उसकी याद ही, मेरे जीवन की सच्चाई है,
वो गयी तब से नहीं लौटी, यहाँ मै और मेरी तन्हाई है,
बनके अनजान मुझे भूला देगी जानता तो खुद से न दूर करता,
किस हाल मे है जान मेरी मै ये पता ज़रूर करता।

उसका पता पता होता तो मै ये ख़ता ज़रूर करता,
किस हाल मे है जान मेरी मै ये पता ज़रूर करता।

10 Comments

  1. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 08/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/03/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/03/2017
  4. Kajalsoni 09/03/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/03/2017

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