क्यूंकि मैं नारी हूँ – अजय कुमार मल्लाह

दुहाई देती रही है मैं,
मुझे छोड़ दो, मुझे मत लूटो,
ये चीख-चीख कर कहती रही मैं,
मुझे छोड़ दो, मुझे मत लूटो,

पर उन दरिंदों पर तो हैवानियत सवार थी,
वो थे शिकारी मेरे और मै उनकी शिकार थी,
मैं लूट गयी बर्बाद हुई,
अच्छा हुआ इस बेजान कुदरत के,
पहरे से मै आजाद हुई,

तब मैंनें कहा,
तुम भी किसी के भाई हो होगी तुम्हारी भी बहन,
जब उसके साथ होगा ये सब,
क्या कर पाओगे तुम ये सहन,
क्यूं शर्म से हैं झुक गई ये निगाहें अब तुम्हारी,
क्या इज्ज़त सिर्फ तुम्हारे घर में है
नही है कोई इज्ज़त हमारी !

घुट-घुट के दर्द मैने सहा,
कभी किसी से कुछ ना कहा,
मुझे अब भी इनायत रब से है,
उसके इन्साफ की आस कब से है।

क्यूंकि मै नारी हूँ!

12 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/03/2017
  2. Kajalsoni 08/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 08/03/2017
  4. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 08/03/2017
  5. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 08/03/2017
  6. Anderyas Anderyas 12/06/2017

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