थोड़ी सी धूप

ऐ सूरज जरा ठहर अपनी किरनों को थोड़ा शहर मे आने दे
बाह बाजार की ठण्ड से मेरी कंपकंपाते हुये बदन को तप जाने दे
ठिठुरते हैं लोग जहाँ पर उनको थोड़ी सी राहत तो दिला जा
अपनी किरनों से उस छोटे से शहर को थोड़ा तो चमका जा
तू दिखता नही पर फिर भी तुझे जल चढ़ा जाते हैं
कोई रामकुण्ड तो कोई रौड़ अपने बदन को तपा जाते हैं
पर अब तुझे इस शहर के बीच आसमां से गुजरना होगा
लोंगो के जल का तुझे कुछ तो कर्ज चुकाना होगा
पर ये क्या तू इतना सुनकर ही पश्चिम से अस्त हो गया
और मेरा बरसों का किया सूर्य-नमस्कार भी ब्यर्थ हो गया
लेकिन सब्र कर
जिस दिन खेड़ा के पर्वत की ऊँचाई घट जायेगी
ठिठुरते हुये बदन को जब तेरी किरन तपा जायेगी
उस दिन म्रेरी सपनों की दो पंक्तियां खुद ब खुद सच हो जायेंगी

6 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 07/03/2017
  2. Kajalsoni 07/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/03/2017
  4. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 07/03/2017
  5. babucm babucm 08/03/2017

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