टूटे हुए सपने …(कविता)

हाय यह क्या हुआ मेरे साथ .
कैसा सितम हुआ जिंदगी के साथ.
संजोये थे जो सपने मैने अपनी आँखों में,
वोह सपने कहाँ खो गए?

कल तक जो जीवन के सफ़र में ,
साथ चल रहे थे हाथों में हाथ डालकर.
खवाब था क्या ?
होश आया तो वोह हाथ भी नहीं.
वोह हाथ कहाँ खो गए ?

वोह शायद मेरा खवाब ही था,
जिसकी हसीं तस्वीर बनायीं थी मन में.
आँख खुली तो वोह तस्वीर भी लुप्त हो गयी.
मेरे दिल के टुकड़े हो गए .

एक मन चाही मंजिल पाने का खवाब देखा था.
एक बेहतर जीवन का सपना ही तो संजोया था.
क्या मैने कोई गुनाह किया था?
मेरे अरमान क्यों मसल दिए गए ?

ओह ! यह दुनिया की कडवी सच्चाई ,
मुझे कहाँ से कहाँ ले आई ?
मेरी बेरहम तकदीर मुझे क्यों ?
अर्श से फर्श पर ले आई .
यह धोखे मेरे साथ इसी ने किये.

उफ़ ! यह कैसा इन्साफ हुआ मेरे साथ ,
मैने तो कभी कोई गुनाह किया ही नहीं.
किस अपराध की मिली है मुझे सज़ा !
यकीं मानिये ! मुझे तो मालूम ही नहीं.
क्या यह खेल मेरे संग नियति ने खेले?
हे भगवान् ! अब तुम बताओ ,
मुझे भेजकर बेरहम दुनिया में ,
तुम कहाँ खो गए.

7 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 22/02/2017
  2. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 22/02/2017
  3. Kajalsoni 22/02/2017
  4. C.M. Sharma babucm 23/02/2017
  5. mani mani 23/02/2017
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/02/2017
  7. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 23/02/2017

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