एक शाम बेवफाई के नाम- मनुराज वार्ष्णेय


छोड़ कहाँ तुम चले गए हो और कहाँ तक जाओगे
उम्मीद रखूँ मैं लौटने की या जीवन भर तड़पाओगे
मदिरा बनेगी मेरी साथी दिन रात मैं इसको पीऊंगा
रूठ जायेगी जिंदगी मुझसे तुम बिन कैसे जीऊँगा

आज सितारे बोल उठे है मावस की जो रात आ गयी
छूट गया फिर उनका साथी आँखों में धुंधली छा गयी
तुम बिन मेरा कोई न अपना पुकारते है ये तारें
लौट आओ अब चन्दा मामा तोड़ के बंधन ये सारे

सागर  लहरों से जूझे दर्द-ए-दिल की ये कश्ती
चीख उठी है लहरें भी अब भूल गयी सारी मस्ती
मैं जल्दी से पार पहुँच जाऊँ लहरें भी ये दुआ करे
इक तुम ही हो जो न समझी तुम बिन कैसे पार करे

4 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 15/02/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 15/02/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/02/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 15/02/2017

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