विरह का साथी – मनुराज वार्ष्णेय

बगीचे मे बैठा था यादों में खोया था
तभी एक तितली मेरे पास आकर बैठ गयी
शायद कुछ कहना चाहती थी अपना हाल सुनाना चाहती थी

पर मैं तो खोया था यादों में प्रियतमा की बाँहों में
महसूस न कोई भी हो रहा था गुजर रहा था जो भी राहों में

एकाएक शुरू हुई हरकत तितली करने लगी मशक्कत
मेरा ध्यान वो भटका गयी मुझे पकड़ वो झटका गयी

टूट गया प्रियतमा का ध्यान देखा हो गयी थी अब मध्याह्न
वो तितली बड़ी अनोखी थी प्रियतमा की याद सोख चुकी थी

उसके रंग बिरंगे पंखों ने मन पर डाला माया जाल
बिन्दु नेत्रों की उपस्थिति से शोभित हो रहा था उसका भाल

उसकी हरकत बड़ी विचित्र दिखा उसका तन आक्रोश में सोया
लग रहा था उसके तन से जैसे उसका कोई अपना खोया

विरह वेदना की पीड़ा उसके मुख से झलक रही थी
जैसे प्रिय मिलन की वासना में वो भी फड़क रही थी

कर सकता था मैं भी क्या दुःख भरी उस तितली के लिए
तड़प रहा था मैं भी दर्द से अपने घाव तक न मैंने सीये

आश्वाशन दे उस तितली को लौट घर को मैं आ गया
समझ नही मैं खुद पा रहा था ऐसा क्या मैं बता गया

3 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 11/02/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/02/2017
  3. mani mani 12/02/2017

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