शिकायत

दिन गुजरते
दबे पाँवों चोर जैसे
बीतती चुपचाप तारीखें
सुस्त कदमों
बीतते इस दौर से
हम भला
सीखें तो क्या सीखें?
 
कांच की किरचों
सरीखे टूटकर
बिखरती हैं राह पर
हर सुबह बाधायें
लाद कर दुर्भाग्य के
अभिलेख सर पर
उतरती हर शाम
कुछ अज्ञात छायायें
मांगनी शनि की अढैया से
उमर यह
चंद मंगलवार की भीखें!
चुक गये हम यों
जनम से उम्र भर
जोड़ने में
 दिन महीना साल को
क्यों न हों
हम समय के सापेक्ष कर लें
इस सदी की
सुस्त कछुआ की चाल को
खो न जाए
सिंधु घाटी में कहीं
प्रार्थनाओं से मिले
नव वर्ष की चीखें!

Leave a Reply