लगता है देश में फिर से चुनाव आ गया -मनुराज वार्ष्णेय

गूँज उठी है धरती मेरे प्यारे हिंदुस्तान की
निकल पड़ी है रैली राजनीति के शैतान की
उठ रहा है अँधा धुआँ चलती सर्द हवाओं से
रचा जा रहा नया षड्यंत्र खेलने को भावनाओं से
अकड़ थी जिस गर्दन में उसमे भी झुकाव आ गया
लगता है देश में फिर से चुनाव आ गया

कल तक जो भूखा था वो भी आज भरपेट सोया है
देख के दरिंदों की करतूतों को दिल मेरा भी रोया है
देश को लूटा जीवन भर आज देश भलाई में तन रहे है
अपाहिज किया है जिन लोगों ने अब वो सहारा बन रहे है
राजनीति के गलियारे में कैसा घुमाव आ गया
लगता है देश में फिर से चुनाव आ गया

हे ईश्वर तेरी मर्जी के बिन इस दुनिया में कुछ भी न हुआ है
लेकिन इन दरिंदों की दरिया दिली ने मेरे आक्रोश को छुआ है
मेरे देश पर फिर से काले बादल का साया है
देश की कुंडली में राहु रूपी राजनेता की छाया है
कविराज तेरे शहर में ये कैसा बदलाव आ गया
लगता है देश में फिर से चुनाव आ गया

नोट- यह कविता सभी प्रकार के राजनेताओं के लिये
नही है सिर्फ उन भृष्टाचारियों के लिए है जो देश बर्बादी में तने हुए है ।

3 Comments

  1. babucm babucm 09/02/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 09/02/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/02/2017

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