उल्फ़त का नूर – शिशिर मधुकर

गुल तेरी मुहब्बत के खिलकर के झर गए
मौसम बसंत के भी सब आकर गुज़र गए

खुशबू दिलों दिमाग से तो मिट ना पाएगी
भंवरे खुश है रस पीकर के वो तो तर गए

उल्फ़त का नूर जिसके जीवन में आ गिरा
उसके सभी सपनें यहाँ कितने निखर गए

जिन चेहरो पे खुशी ना थी गम का राज था
घरों के आइने भी उनकी खातिर सँवर गए

वो सोचा किये कत्ल का तैयारियों के साथ
देखी मेरी जो हालात तो वो सब भी डर गए

शिशिर मधुकर

12 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 08/02/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/02/2017
  2. "sadashubhani" nivedita nivedita pandey 08/02/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/02/2017
  3. C.M. Sharma babucm 09/02/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/02/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/02/2017
  4. Kajalsoni 10/02/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/02/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/02/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/02/2017

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