मुहब्बत की शाम—डी. के. निवातिया

वफ़ा होने से पहले मुहब्बत की शाम न हो जाये !
प्यार के इम्तिहान में, कही नाकाम न हो जाये !!

बेवफ़ा लोगों की सौबत में रहना क़िस्मत ही सही !
इनमें होकर शामिल नाम तेरा बदनाम न हो जाये !!

चाहत कल थी जितनी तुमसे आज भी उतनी है !
ये ख़याल दिल में तेरे उभर के ख़ाम न हो जाये !!

तेरी मेरी कहानी भी आशिको की तरह बनकर !
लैला-मजनू, सिरी-फरहाद के नाम न हो जाये !!

आ चल जी लेते है इस पल को ताउम्र समझकर !
इससे पहले प्रीत “धर्म” की सरेआम न हो जाये !!
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डी. के. निवातिया

ख़ाम= कच्चा, हरा, नौसिखिया, अदक्ष, घमंडी

10 Comments

  1. mani mani 07/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/02/2017
  2. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 07/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/02/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/02/2017
  4. C.M. Sharma babucm 08/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/02/2017

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