गुनाह—गजल-नज्म— डी. के. निवातिया

क़त्ल न कोई गुनाह किया हमने !
बस दर्द ऐ दिल बयाँ किया हमने !!

जाने क्यों नुक्ताचीनी होने लगी !
जरा लबो को जो हिला दिया हमने !!

देखे लिये जब नाइत्तिफ़ाक़ी के मनसूबे !   
अपने ही जज्बातो को  दबा लिया हमने !!

कौन रखे है तबस्सुम-ऐ-एहसास यहाँ !  
इसलिये तिश्नगी को बुझा लिया हमने !!

अब न कोई गिला न शिकवा रहा किसी से !
ह्या के नकाब में धर्म को छुपा लिया हमने !!
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डी. के. निवातिया ________@

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नुक्ताचीनी=दोषारोपण, दोष लगाना, नकारात्मक समीक्षा
नाइत्तिफ़ाक़ी= असहमति, मतभेद
तिश्नगी= तृष्णा, प्यास, लालसा, अभिलाषा
ह्या=शर्म, शील, लज्जा

 

12 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 02/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/02/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 02/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/02/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/02/2017
  4. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 03/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/02/2017
  5. Kajalsoni 05/02/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/02/2017

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