लो! बसंत सुहाना आ गया—मधु तिवारी

लो! बसंत सुहाना आ गया
श्याम सलोना मनभावन सा
सबके मन को भा गया
लो बसंत सुहाना आ गया

सुखद पूरवाई बहने लगी है
कोयल भी कुहु कुहु कहने लगी है
आम्र तरु मंजरी छा गया
लो बसंत सुहाना आ गया

बगिया महके बेला चमेली से
प्रात के ये मोती बने पहेली से
जाने ये कौन बिखरा गया
लो बसंत सुहाना आ गया

खेत खलिहान लहलहाने लगे
बालियों के घुंघरू घनघनाने लगे
पीत रंग सरसों नहा गया
लो बसंत सुहाना आ गया

छोड़ दिया पट पत्ते कल का
पहने तरू नया मखमल का
परिवर्तन का संदेश बहा दिया
लो बसंत सुहाना आ गया

कवयित्री– मधु तिवारी

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/02/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 01/02/2017
  3. mani mani 01/02/2017
  4. C.M. Sharma babucm 01/02/2017
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 01/02/2017
  6. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 02/02/2017
    • Madhu tiwari Madhu tiwari 02/02/2017
  7. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/02/2017
    • Madhu tiwari Madhu tiwari 03/03/2017
  8. Madhu tiwari Madhu tiwari 03/02/2017

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